Deepak Shankhdhar sharma
Tuesday, 19 May 2026
संघ में भाषा की सार्वभौमिकता: संघ की पहचान
Tuesday, 9 December 2025
भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष - एक पेचीदा प्रश्न
Thursday, 17 April 2025
बंगाल में तड़पता लोकतंत्र
Thursday, 27 March 2025
शीर्षक: संघ का संजय
Sunday, 16 February 2025
भूकम्प
तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं,
कमाल है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं"
आज 17-02-2025 को लगभग सुबह 5:30 बजे, मैं सो रहा था। ऐसा लगा मानो किसी बेड खिसका दिया हो। जब उठा तो सब कुछ सामान्य था। कोई पंखा नहीं हिल रहा था। हमें लगा वहम है। फिर हमारा स्टेटस देख, हमें जगा हुआ जान कर भाई का कॉल आया कि क्या भूकंप महसूस हुआ? ओह! पृथ्वी डोल गई, यह बात सोचकर अनेकों प्रश्न दिमाग में कौंध गए। अपनों की चिंता हुई। भविष्य को लेकर प्रश्न की एक लकीर दिमाग में खिंच गई कि हम कहाँ जा रहे हैं? हमने धरती पर जो बोझ लादा है ये कंक्रीट के जंगल तैयार कर के...ये ऊंची ऊंची इमारते...कहाँ एक गाँव किलोमीटर में फैला होता था और आबादी सीमित थी । आज नोएडा जैसे शहर में लगभग 5000 मीटर लगभग 5 बीघा में एक गाँव बसा दिया है जो हवा में लटका हुआ है। किसी आपात की स्थिति में 20 मंजिल छोड़िए 5 मंजिल उतरना भारी हो जाएगा। पिज़्ज़ा, बर्गर और मैदा खा कर जीने का "अकर्मण्य युग"। "अकर्मण्य" इसलिए मैदा को पचा लें वो शारीरिक श्रम हम पर नहीं है, केवल दिमागी काम है। जो भाग रहे हैं वो पैरों से नहीं भाग रहे, बल्कि वो वाहनों से दौड़ रहे हैं। ख़ैर! सब कुछ ठीक है पर कुछ बातें ठीक नहीं है।जड़, ज़मीन और मानवता से जुड़े रहने पड़ेगा।
आज के ज़माने के पश्चिम उत्तरप्रदेश एक लोकगीत गायक की पंक्तियां याद आती हैं-
धरती पर मेरे पैर रहें, हाथों से टच स्काई रे
जहां पर मेरे कदम पड़े, वहां आ जाती है सुनामी रे
सच में मानव जहाँ तक फैल रहा है अपने कृत्यों से सुनामी ला रहा है। हाथों से स्काई टच करने के चककर में पैरों से धरती छूट रही है। यह विचारणीय है।
मानव जाति को इस बात पर सोचना चाहिए।
इस पर दुष्यंत कुमार की पंक्तियां याद आती हैं कि -
"तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं,
कमाल है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं"
दीपक शंखधार।
ये मेरे अपने निजी विचार हैं। किसी को ठेस पहुंचाना इनका मकसद नहीं है।
Sunday, 12 June 2022
हिंदू साम्राज्य दिवस
Sunday, 16 January 2022
कर्मयोगी महेश
महेश अर्थात "महा ईश"।अब कोई महा ईश ऐसे ही नहीं बन जाता। भाई तपस्या करनी पड़ती है। तपस्या रूपी यज्ञ में कर्म आहूत करना पड़ता है। तब जाकर सिद्धि प्राप्त होती ही और तब एक कर्मयोगी महेश कहलाता है। मतलब महेश होना पराकाष्ठा है। इस कर्मयोग का ही सुफल है कि व्यक्ति सिद्ध है। महेश विष को गले मे धर कर उसकी पीड़ा को सहकर निरंतर राजा की बगिया के फूलों को गंगा रूपी जल प्रदान करने वाले हैं।जहाँ अस्तित्व संकट में रहता हो ऐसे स्थान पर स्वयं को स्थापित करना।अपने समाज को सुरक्षा हेतु आश्वस्त करना। ऐसे ही कोई कोई महादेव नहीं हो जाता। समाज के रक्षण की चिंता करनी होती है। राजाओं के लड़के जिन पशु पक्षियों का शिकार जीवन भर शक्ति मद में करते हैं। महादेव उन का भी रक्षण करते हैं। आसान नहीं महेश हो जाना।राजा की बगिया के फूल महेश के चरणों को तो छू सकते हैं पर समान्तर कभी नहीं हो सकते। पर छू भी तभी सकते हैं जब स्वयं महेश चाहे। क्योंकि महेश तो कंठ में गरल को रोककर, गले में भयंकर सर्पों को धारण कर ऐसी दुर्गम परिस्थित में भी शीश पर चंद्रमा और गंगा प्रवाह कर समाज को शांति और सुखता प्रदान करते हैं।
अभी के लिए इतना ही.. शेष अगले अंको में। अभी तो अपने महेश को पहचान कर उन्हें ताकत प्रदान करिए क्योंकि अभिमानियों को तो कभी कभी लगता है कि वो महेश समेत हिमालय उठा लेंगें। पर अभिमान भंग के लिए परशुराम भी बनना पड़ता है।