राजनीति यूं तो एक अच्छा शब्द है जो एक सत्ता के पक्ष विपक्ष दोनों परिप्रेक्ष्य में सटीक बैठ जाता है। फिर भी राजनीति शब्द के मायने "राज्य के लिए नीति निर्धारण" करने वाली शक्तियों से ही सम्बद्ध होते हैं। ख़ैर! देश काल परिस्थिति अनुसार सब बदलता है ये भी बदला। आज राजनीति के व्यवहारिक मायने कुछ बदले और सभी विषयों की तरह इस विषय ने भी विभिन्न आयामों के सफ़र को तय किया। 1947 से पूर्व भारत में और 14वीं शताब्दी से पूर्व विश्व में राजशाही किस्म का शासन था और आज भारत और विश्व के अनेकों हिस्सों में लोकतांत्रिक।
भारत के परिप्रेक्ष्य में यदि बात करें तो ध्यान में आएगा कि दो ही राजनैतिक दल राष्ट्रीय स्तर पर व्यवहारिक रूप से वृहदता को प्राप्त कर पाए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी। भारतीय जनता पार्टी मूलतः हिन्दू संगठनों की राजनीतिक परिकल्पना है।
हिन्दू संगठनों की राजनीतिक परिकल्पना अर्थात क्या?
एक ऐसा राजनैतिक विचार जो किसी विदेशी आक्रांताओं का सेफ्टी वाल्व, राजनीतिक महत्वकांक्षा का केंद्र ना हो। जो भारत की संस्कृति को जीवन्त बनाये रखने में सक्षम हो।ध्यान रहे विधायिका ही वह इकाई है जहां से सामाजिक परिकल्पनाएं लोकतांत्रिक राज्य में संवैधानिक रूप से व्यवहार प्राप्त करतीं हैं।यही आवश्यक है क्योंकि कोई संगठन राष्ट्र से आगे नहीं है। सामाजिक संगठन के तौर पर कोई संगठन अच्छे समाजसेवी तैयार कर सकता है जो भविष्य में अच्छे नेतृत्व के रूप में अपनी भूमिका तय कर सकते हैं।
इस सिद्धांत को यदि ठीक ठीक किसी ने अपनाया तो वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू संगठनों के राजनैतिक आयाम वाले दल भारतीय जनता पार्टी ने। भारतीय जनता पार्टी का संगठन मंत्री, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक होता है। प्रचारक निजी जीवन में एकला चलो की नीति अपनाते हुए सामाजिक व्यवस्था में सामूहिक रूप से चलता है यानी उसका अपना कुछ नहीं है सब समाज से, समाज के द्वारा और समाज के लिए है।ऐसा चरित्र वान व्यक्ति यदि किसी राजनैतिक दल का मेरूदण्ड हो तो ये बताने की आवश्यकता नहीं है कि संगठन का चरित्र कैसा होगा।इसी प्रकार भाजपा में अधिकतर नेतृत्व मूल स्वभाव से स्वयंसेवक ही होता है। जो सामाजिक कार्य करने की प्रेरणा, शैली, अचार, विचार और व्यवहार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से ही सीख समझ और परख कर आता है।ऐसे में अपवाद छोड़कर लगभग अधिकतम संख्या विचार के प्रति निष्ठावानों की हो जाती है।उसी की परिणीति है 2014,2019 लोकसभा चुनाव का परिणाम।
वर्तमान में राज्यों और केन्द्र की स्थिति से ये नि:संकोच कहा जा सकता है कि भाजपा अपने राजनैतिक उच्चतम शिखर पर है। ऐसे में ये ध्यान रखने की आवश्यकता है कि विचार को व्यवहार में स्थायित्व देने में विकृति ना आ जाये क्योंकि ऐसी संभावना है। ऐसा इसलिए क्योंकि भाजपा के सक्रिय सदस्यों में मूल स्वयंसेवकों की संख्या से अधिकतम संख्या बाहरी लोगों ने प्राप्त कर ली है। जिनके लिए भाजपा केवल राजनीति करने का आयाम है जबकि स्वयंसेवकों को हिंदुत्व संस्कृति को संवैधानिक रूप से समृद्ध करने का रास्ता है भाजपा।
ऐसे में महत्वपूर्ण दायित्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है क्योंकि भाजपा चाहे राजनैतिक रूप से प्रबलतम स्थिति में हो पर इस विश्वास का आधार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तपस्या है। ये ठीक वैसा ही है जैसे महृषि दधीचि की तपस्या से इंद्र को वज्र शस्त्र मिला। गांधी के विचारों के कारण कांग्रेस को शासन।
शेष अगले अंकों में.....
दीपक शंखधार, नोएडा
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