वर्तमान समय में संघ शब्द ध्यान में आते ही एक संगठन का ऐसा चित्र आंखों के सामने उभरता आता है जो समन्वय और एकरूपता का द्योतक है । चूंकि विषय भाषा और बोली तक सीमित रखना है इसलिए संघ के वैचारिक और अन्य व्यावहारिक पक्षों तक नहीं जाते। इस लेख को केवल भाषा और बोलचाल तक सीमित रखते हैं।
भारत जैसे विभिन्नताओं से भरे हुए देश जहां ऐसी कहावत प्रचलन में है कि "कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी" ऐसे में यदि कोई संगठन अपनी शैली में एकरूपता को व्यवहार में उतार कर "एक भारत" होने का श्रेष्ठ उदाहरण प्रस्तुत कर पाया है तो वह संघ है।
संघ की शाखा, जो कि इस संगठन का मूलाधार है। शाखा में आज्ञा, प्रार्थना, ध्वज प्रणाम, और आम बोल चाल में समानता है। संघ में एक दूसरे के नाम के साथ "जी" जैसे सम्मानित प्रत्यय का प्रयोग पूरे विश्व भर में स्वयंसेवकों के बीच प्रचलित है, चाहे वह अवध का स्वयंसेवक हो, खड़ी बोली वाले पश्चिम का, दक्षिण या उत्तरपूर्वी राज्यों का। पुरुषों में अपने से छोटे आयु के स्वयंसेवक को भैया और बड़े को भाईसाहब , स्त्रीलिंग में अपने से छोटी बहन को दीदी और बड़ी बहन को बहन जी का प्रचलन है। इन सम्मानित शब्दों के प्रचलन से स्वत: ही आत्मीयता और सम्मानित भाव का प्रकटीकरण होता है।
ऐसे विभिन्नता भरे परिवेश में एक राष्ट्र का विचार प्रबल हो और राष्ट्र की अखंडता अक्षुण्य रहे इसके लिए संघ ने इसका समाधान 'समान शब्दावली' से निकाला। सम्मानपूर्ण समान शब्दावली विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों के लहजे और पिच के अंतर को पाटकर एक साझा आत्मीय मंच तैयार करती है। ऐसी शब्दावली जो हमारे आद्य संस्कारों में है। यह संबोधन आदर देता है और क्षेत्रीय दूरी भी नहीं बनने देता है। ऐसी संवादशैली का व्यावहारिक व्यक्ति अहंकारहीन भी बना रहता है।
खैर! आज इस लेख को लिखने का भाव मन में इसलिए आया कि वर्तमान में भारत ही नहीं विदेशों में भी सामाजिक संगठनों से लेकर राजनीतिक संगठन तक संघ की संगठनात्मक शैली को आदर्श मान कर उसके अनुकरण का प्रयास कर रहे हैं। भाषा एक माध्यम है प्रकटीकरण का , आत्मीय डोर को और सुदृढ़ करने का। सो भाषा का प्रकटीकरण सौम्य, सम्मान जनक रहने से आत्मीयता का संचार स्वत: संबंधों में होता है।
भाषा, लहजा, आवाज के उतार-चढ़ाव में समन्वय होने से बहुत कुछ सहज हो जाता है कई बार आपके विपरीत परिस्थितियां भी। सो संघ से इतना तो सीखे कि भाषा , शब्दों की मर्यादा और संवाद के अन्य कारकों पर नियंत्रण एक उत्कृष्ट नेतृत्व के गुण को मजबूत करता है।जब भाषा सौम्य और नियंत्रित होती है, तो विपरीत परिस्थितियों में भी टकराव की संभावना न्यूनतम हो जाती है। यही नियंत्रण, समन्वय, एकरूपता गुण है जो भारतीय जनता पार्टी जैसे विशाल संगठन को विभिन्नता से भरे देश भारत में दिन प्रतिदिन संगठनात्मक स्तर पर मजबूत करता जा रहा है। इससे व्यक्ति संगठन में पदक्रम होते हुए भी स्वयं को किसी कॉर्पोरेट ढांचे का हिस्सा नहीं, बल्कि एक बड़े परिवार का अंग मानता है। यही कारण है कि संघ के प्रचारक या स्वयंसेवक किसी भी अन्य भौगोलिक क्षेत्र या विपरीत परिस्थितियों में जाकर भी अपनी इसी संगठन शैली से विपरीत परिस्थितियों को अपने पक्ष में कर लेते हैं।
हम कह सकते हैं कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि संगठन को एक सूत्र में पिरोने वाला 'गोंद' भी है। भाषा "संघें शक्ति कलयुगे" जैसी सूक्ति को व्यावहारिक करने का एक मजबूत उपकरण है।
एडवोकेट दीपक शंखधर, नोएडा।
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